झूठ का पत्थर या इतिहास का
कुछ पत्थर के टुकड़े एक दिन फर्ज़ी पाए जाते हैं और 100 से अधिक देशों में हलचल पैदा हो जाती है। जैसे ये पत्थर नहीं बल्कि कोई अनमोल वस्तु थे। है भी! ये पत्थर के टुकड़े आखिर चांद की सतह के जो थे। ये पत्थर चाँद पर मानवता के कदमों की निशानी बयाँ करते थे।
नीदरलैंड के एक राष्ट्रीय संग्रालय में चंद्रमा का एक पत्थर नकली पाया गया। जैसे ही यह खबर फैली वैसे ही विषेशक्षों ने चिल्लाना शुरू कर दिया पत्थर गायब हो गया है या चोरी हो गया है। बाकी पत्थरों के बारे में भी यह आशंका व्यक्त की जा रही है, हो सकता है यह सच भी हो।
मगर इस खुलासे ने कहीं न कहीं उस आग को फिर हवा दे दी है या कहें कि उन लोगों को बोलने का फिर से मौका दे दिया है जो दबी ज़ुबान से मानवता के इतिहास की सबसे लंबी छलांग को सिर्फ अमरीका कि सबसे आगे निकलने की भूख का एक काला झूठ मानते हैं।
नील आर्मस्ट्राँग के चाँद पर उतरने को लेकर आज भी दनिया दो हिस्सों में बटी हुई है। पर यह घटना इस बात की ओर संकेत करती है कि कहीं न कहीं दाल में काला ज़रूर है। मसलन एक जगह अगर पत्थर नकली पाया जाता है तो विशेषज्ञ बाकि जगह इनके नकली होने का प्रमाण पत्र जारी कर देते हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि अमरीका अपनी साख बचाने के लिए विशेषज्ञों का सहारा लेकर कुछ छुपाने कि कोशिश कर रहा है। चाहे बात कुछ भी हो! इस खुलासे ने दबे विवाद को फिर से पंख लगा दिए हैं। वैसे एक कहावत है कि अगर कोई बात झुठ नहीं तो ज़रूरी नहीं वो सच भी हो।