
महान विचारक विलियम पेन ने 17वीं शताब्दी में कहा था ‘जस्टिस दिलेड इज जस्टिस डिनाइड’ अर्थात इंसाफ से देरी इंसाफ से इंकार है। आज 21वीं सदी में भी लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट इस विचार को सार्थक करती है।
17 साल का लंबा अंतराल, 8 करोङ का खर्च और 48 बार कार्यकाल बढाने के बाद लिब्राहन आयोग ने अपनी रिपोर्ट सरकार के सामने पेश की जिसे उसे 3 महीने के अंदर पेश करना था।
बाबरी मस्जिद का ढहाए जाना भारतीय लोकतंत्र पर एक काले धब्बे के समान है। उम्मीद की जा रही थी कि लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट इस हादसे की नई परतें खोलेगी। मगर इस रिपोर्ट में ऐसा कुछ भी नहीं था जो लोगों की नज़रों से छिपा हो। यानि की ज़्यादातर आयोगों की तरह इस आयोग ने भी देश का पैसा और समय दोनों बर्बाद किया।
रिपोर्ट में आयोग ने कुल 68 लोगों को दोषी ठहराया है जिनमें यू.पी. के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिहं, पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, मनोहर जोशी आदि शामिल हैं। अटल बिहारी वाजपेयी और देवराहा बाबा का नाम इस रिपोर्ट में आना इस रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह लगाते हैं। क्योंकि आयोग ने न तो कभी वाजपेयी को तलब किया और न ही उनसे कभी सवाल-जवाब पूछे और देवराहा बाबा का तो 1990 में ही स्वर्गवास हो गया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव को क्लीन चिट दिए जाना भी इस रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर सवाल उठाता है। यही नहीं जब सारा विपक्ष सरकार को मंहागाई और भ्रष्टाचार पर घेर रहा था उस वक्त रिपोर्ट का एक अखबार द्वारा लीक किए जाना और फिर सदन के पट पर इस तरह रखे जाना भी कहीं न कहीं इस ओर संकेत करता है। यहाँ तक की इस रिपोर्ट की ए.टी.आर में भी किसी के ऊपर कोई ‘एक्सन’ नहीं लिया गया है।
इस रिपोर्ट से अगर किसी को फायदा हुआ है तो वह है राजनीतिक दल जिन्हें अपनी राजनीति की दुकान फिर से चमकाने का मौका मिल गया है। हालांकि यह मुद्दा इतना पीछे छूट चुका है कि खुद बी.जे.पी ने चुनाव में इसे अपना मुद्दा नहीं बनाया। अंग्रजी में एक कहावत है ‘ एफ यू डोंट वाटं टू कमिट, अपाइंट ए कमेटी’। शायद इसका गठन भी इसलिए किया गया था।
खैर देर आए, दुरस्त आए। अब देखना यह है कि सरकार इस रिपोर्ट के सहारे दोषियों को सज़ा दे पाती है या बाकी रिपोर्टों की तरह यह भी किसी फाइल में बंद एक कोने में फेंक दि जाती है।


