29 नवंबर 2009

लिब्राहन आयोग- सच्चाई से परे


महान विचारक विलियम पेन ने 17वीं शताब्दी में कहा था ‘जस्टिस दिलेड इज जस्टिस डिनाइड’ अर्थात इंसाफ से देरी इंसाफ से इंकार है। आज 21वीं सदी में भी लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट इस विचार को सार्थक करती है।
17 साल का लंबा अंतराल, 8 करोङ का खर्च और 48 बार कार्यकाल बढाने के बाद लिब्राहन आयोग ने अपनी रिपोर्ट सरकार के सामने पेश की जिसे उसे 3 महीने के अंदर पेश करना था।
बाबरी मस्जिद का ढहाए जाना भारतीय लोकतंत्र पर एक काले धब्बे के समान है। उम्मीद की जा रही थी कि लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट इस हादसे की नई परतें खोलेगी। मगर इस रिपोर्ट में ऐसा कुछ भी नहीं था जो लोगों की नज़रों से छिपा हो। यानि की ज़्यादातर आयोगों की तरह इस आयोग ने भी देश का पैसा और समय दोनों बर्बाद किया।
रिपोर्ट में आयोग ने कुल 68 लोगों को दोषी ठहराया है जिनमें यू.पी. के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिहं, पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, मनोहर जोशी आदि शामिल हैं। अटल बिहारी वाजपेयी और देवराहा बाबा का नाम इस रिपोर्ट में आना इस रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह लगाते हैं। क्योंकि आयोग ने न तो कभी वाजपेयी को तलब किया और न ही उनसे कभी सवाल-जवाब पूछे और देवराहा बाबा का तो 1990 में ही स्वर्गवास हो गया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव को क्लीन चिट दिए जाना भी इस रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर सवाल उठाता है। यही नहीं जब सारा विपक्ष सरकार को मंहागाई और भ्रष्टाचार पर घेर रहा था उस वक्त रिपोर्ट का एक अखबार द्वारा लीक किए जाना और फिर सदन के पट पर इस तरह रखे जाना भी कहीं न कहीं इस ओर संकेत करता है। यहाँ तक की इस रिपोर्ट की ए.टी.आर में भी किसी के ऊपर कोई ‘एक्सन’ नहीं लिया गया है।
इस रिपोर्ट से अगर किसी को फायदा हुआ है तो वह है राजनीतिक दल जिन्हें अपनी राजनीति की दुकान फिर से चमकाने का मौका मिल गया है। हालांकि यह मुद्दा इतना पीछे छूट चुका है कि खुद बी.जे.पी ने चुनाव में इसे अपना मुद्दा नहीं बनाया। अंग्रजी में एक कहावत है ‘ एफ यू डोंट वाटं टू कमिट, अपाइंट ए कमेटी’। शायद इसका गठन भी इसलिए किया गया था।
खैर देर आए, दुरस्त आए। अब देखना यह है कि सरकार इस रिपोर्ट के सहारे दोषियों को सज़ा दे पाती है या बाकी रिपोर्टों की तरह यह भी किसी फाइल में बंद एक कोने में फेंक दि जाती है।

मनमोहन की अमरीका यात्रा- क्या है असली आधार?


हमारे समाज में एक कहावत है ‘दोस्ती हमेशा बराबर की हैसियत वालों से की जाती है’।मगर आज के संदर्भ में यह कहावत झूठी जान पङती है। पिछले कुछ समय से जिस तरह से विश्वपटल पर राजनीतिक समीकरण बदले हैं उसे देखकर तो यही लगता है कि कूटनितिज्ञ संबंधो की बुनियाद आर्थिक रिश्तों पर रखी जाने लगी है।
अमरीका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अपना पहला राजरीय अतिथि बनाया। ओबामा के 10 महीने के शासन में यह पहला मौका है जब दोनों देशों के रिश्तों में इतनी गर्माहट आई हो। दोनों देशों के बीच आतंकवाद, स्वास्थय, सुरक्षा, हरित टेक्नोलोजी सहित अनेक सहमति पत्रों पर दस्तखत हुए मगर एटमी उर्जा, तालिबान-पाकिस्तान, चीन और जलवायु जैसे अति संवेदनशील मुद्दों पर मतभेद अभी भी कायम है और यही भारत के लिए सबसे बङी चिंता का कारण है। पिछले कुछ सालों में चीन अमरीका का सबसे बङा व्यपारिक साझेदार बनकर उभरा है। वहीं पाकिस्तान की ज़रूरत अमरीका को अफगानिस्तान में अधूरे सैन्य मिशन के लिए ज़रूरी है। ओबामा ने चीन यात्रा के दौरान तिब्बत को चीन का अभिन्न अंग बताकर भारत की मुश्किलें ओर बढा दी। पाकिस्तान से मिलने वाली सहायता राशि भी ओबामा सरकार ने दोगुनी कर दी है। इस यात्रा से मनमोहन सिंह अमरीका द्वारा दवाब बनाकि 26/11 के दोषियों पर कार्यवाही करवाने में भी नाकाम रहें है। अमरीका के साथ रिश्ता मजबूत करने से पहले भारत इन तथ्यों को नज़र अंदाज़ नहीं कर सकता।
आज अमरीका और भारत दोनों को एक दूसरे की ज़रूरत है। अमरीका पूंजी के साथ-साथ टेक्नोलोजी का भी भारत में सबसे बङा स्रोत है। अमरीका से आर्थिक रूप से जुङकर ही भारत चीन से आगे निकल सकता है। वहीं अमरीका अभी भी मंदी की मार से बाहर नहीं निकल पाया है। अंतराष्ट्रीय बाज़ार में डालर पर मंडराते संकट के कारण भी अमरीका का झुकाव भारत की तरफ बढा है। आने वाला वक्त ही इस रिश्ते की दिशा तय करेगा मगर इस यात्रा में जिन सहमति पत्रों पर हस्ताक्षर हुए हैं उन्हें देखकर तो यही लगता है कि इस दोस्ती की इमारत आर्थिक रिश्ते की नींव पर रखी जा रही है।

05 नवंबर 2009

डी.टी.सी किराए में बढ़ोतरी- फायदा किसका ?


दिल्लि में बसों का किराया बढ़ने का बोझ आम आदमी की जेब पर कितना भारी पड़ा है इसका अहसास मुझे तब हुआ जब रोज़ाना की वही दुरी मुझे 2 गुना किराया देकर करनी पड़ी।
डी.टी.सी का घाटा कम करने के लिए सरकार ने किराया बढ़ाने का फैसला किया है। साथ ही परिवहन मंत्री अरविंदर सिंह लवली ने यह भी कहा कि बेहतर परिवहन के लिए लोगों को कुछ ज़्यादा किराया तो देना ही होगा। डी.टी.सी का सालाना घाटा 600 करोड़ रूपए है। किराया बढोतरी के बाद इसके 200 करोड़ रहने की उम्मीद है। मतलब साफ है, यह इज़ाफा घाटा कम करने के इरादे से किया गया है न कि लोगों को बेहतर परिवहन दिलाने के मकसद से। और इस घाटे को कम करने का बोझ उठाएगा आम आदमी। वहीं मंत्री जी यह भी कहने से नंही चूके कि बाकि राज्यों से दिल्लि में बस किराया कम है और प्रति व्यक्ति आय ज़्यादा। यानी मंत्री जी आमदनी के एक ही तराज़ू में सबको तोल रहे हैं चाहे वह बमुश्किल दो जून की रोटी कमाने वाला रिक्शेवाला हो या सफेद पोश बाबू या लक्ज़री कारों में चलने वाला कोई उद्योगपति। मंत्री जी बस का किराया बढ़ने से न तो किसी गाड़ी में चलने वाले व्यक्ति पर असर पड़ेगा और न ही आटो से चलने वाले को। फर्क पड़ेगा उस आम आदमी को जिसकी ‘लाइफ लाइन’ बस है। जो रोज़ बस से आता-जाता है। जहाँ अमूमन कोई व्यक्ति हर महीने 300 रूपए किराया देता था अब उसे 600 रूपए देने होंगे। यानि अब खर्च करना होगा ‘उम्मीद से दुगना’।
डी.टी.सी की बेहतर सुविधा प्रदान करने के लिए किराया बढ़ाया गया है मगर जब तक डी.टी.सी की नई बसें नहीं आ जाती तब तक ब्लू लाइन से ही गुज़ारा करना पङेगा। यानि मँहगा किराया देकर भी खस्ता हाल ब्लू लाइन में सफर करना होगा। जिस रफ़्तार से डी.टी.सी बसें सङकों पर आ रही है उसे देखकर लगता है कि ब्लू लाइन को हटने में अभी सालों लगेंगे। मतलब ब्लू लाइन ओपरेटर तो पहले ही फायदे में थे, अब तो मालामाल हो जाएंगे।
यानि इस बढ़ोतरी से चाहे डी.टी.सी क घाटा कम हो न हो, आम लोगों को अच्छी परिवहन व्यवस्था मिले न मिले, प्राइवेट बस आपरेटरों की तो चाँदी हो गई है। पहले वह सिर्फ दूध पीते थे मगर अब मलाई मार कर पियेंगे।

24 अक्टूबर 2009

क्या ओबामा सही में 'शांति दूत' है।




1994 में जब फिलीस्तीनी नेता यासिर आराफात को शांति का नोबेल मिला था तो माखौल उङा था कि ‘ क्या इस बार पुरस्कार के लिए हत्यारा होना शर्त थी’। मगर इस बार ‘क्या सिर्फ बातें और कुछ वादें´ काफी थे।
नोबेल कमेटी ने अमेरीका के राष्ट्रपति बराक ओबामा को वर्ष 2009 का नोबेल शांति पुरस्कार देने की घोषणा की है। यह पुरस्कार पाने वाले वह अमरीका के चौथे राष्ट्रपति है। इसके पीछे उन्होनें ओबामा के पिछले एक साल के काम की वकालत की है जिसमें उन्होनें दुनिया को परमाणु हथियार रहित और फिलिस्तीन और इज़राइल में अमन बढ़ाने की बातों का ज़िक्र किया है।
ओबामा ने 20 जनवरी 2009 को राष्ट्रपति पद की शपत ली थी। पुरस्कार के नाम लेने कि अंतिम तारीख 11 फरवरी थी। यानि केवल 11 दिन के कार्यकाल के लिए उन्हें यह पुरस्कार दिया गया है। अगर हम इस बात को भी दरकिनार कर दें तब भी जब जून में निर्णायकों ने अपने मत दिए थे, उनके कार्यकाल को केवल 4 माह ही हुए थे। हो सकता है काहिरा में उनके द्वारा ‘अस्लाम वालेकुम’ कहना कमेटी को असाधारण लगा हो।
एक ऐसे देश के राष्ट्रपति को नोबेल दिया जाना जो 2 देशों में जंग लङ रहा हो बेमानी लगता है। ओबामा अफगानिस्तान से सेना बुलाने के अपने फैसले पर पूरी तरह खरे नहीं उतरे सके। परमाणु रहित दुनिया की बात करने वाले ओबामा जिस देश के राष्ट्रपति है उसके पास ही दुनिया का सबसे बङा परमाणु भंडार है। उस भंडार को कम करने के उन्होंने कितने प्रयास किए। अगर सिर्फ बातों और वादों पर ही नोबेल मिलना था तो भारत के सभी नेता इसके हकदार थे।
हो सकता हे नोबेल कमेटी ओबामा को खुश करना चाहती हो या हो सकता हे कि यह उनकी विवशता रही हो। जिस छवि के साथ ओबामा राष्ट्रपति बने थे वह लगातार गिर रही थी। इसकी एक ताज़ा कङी हे 2016 के ओलंपिक की मेज़बानी जिसे वह अमेरिका को दिलाने में नाकाम रहे। अपनी लगातार गिरती छवि को फिर से मंच प्रदान करने का सबसे सही मौका था। ये भी हो सकता हे कि कमेटी नोबेल पुरस्कार देकर ओबामा पर विश्व शांति का दबाव बढाना चाहती हो।
ऐसा नहीं हे कि ओबामा ने विश्व शांति के लिए कोई काम नहीं किया। उनके काम सराहनीय है। मगर उनमें अभी भी ज़मीनी हकीकत नज़र नहीं आति। मगर इसमें भी कोई दो राय नहीं कि ओबामा को नोबेल देने में जल्दबाज़ी की गई है। ओबामा को यह पुरस्कार मिल तो गया हे मगर अब उन्हें यह हासिल करके दिखाना होगा।

17 सितंबर 2009

झूठ का पत्थर या इतिहास का
कुछ पत्थर के टुकड़े एक दिन फर्ज़ी पाए जाते हैं और 100 से अधिक देशों में हलचल पैदा हो जाती है। जैसे ये पत्थर नहीं बल्कि कोई अनमोल वस्तु थे। है भी! ये पत्थर के टुकड़े आखिर चांद की सतह के जो थे। ये पत्थर चाँद पर मानवता के कदमों की निशानी बयाँ करते थे।
नीदरलैंड के एक राष्ट्रीय संग्रालय में चंद्रमा का एक पत्थर नकली पाया गया। जैसे ही यह खबर फैली वैसे ही विषेशक्षों ने चिल्लाना शुरू कर दिया पत्थर गायब हो गया है या चोरी हो गया है। बाकी पत्थरों के बारे में भी यह आशंका व्यक्त की जा रही है, हो सकता है यह सच भी हो।
मगर इस खुलासे ने कहीं न कहीं उस आग को फिर हवा दे दी है या कहें कि उन लोगों को बोलने का फिर से मौका दे दिया है जो दबी ज़ुबान से मानवता के इतिहास की सबसे लंबी छलांग को सिर्फ अमरीका कि सबसे आगे निकलने की भूख का एक काला झूठ मानते हैं।
नील आर्मस्ट्राँग के चाँद पर उतरने को लेकर आज भी दनिया दो हिस्सों में बटी हुई है। पर यह घटना इस बात की ओर संकेत करती है कि कहीं न कहीं दाल में काला ज़रूर है। मसलन एक जगह अगर पत्थर नकली पाया जाता है तो विशेषज्ञ बाकि जगह इनके नकली होने का प्रमाण पत्र जारी कर देते हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि अमरीका अपनी साख बचाने के लिए विशेषज्ञों का सहारा लेकर कुछ छुपाने कि कोशिश कर रहा है। चाहे बात कुछ भी हो! इस खुलासे ने दबे विवाद को फिर से पंख लगा दिए हैं। वैसे एक कहावत है कि अगर कोई बात झुठ नहीं तो ज़रूरी नहीं वो सच भी हो।