29 नवंबर 2009

मनमोहन की अमरीका यात्रा- क्या है असली आधार?


हमारे समाज में एक कहावत है ‘दोस्ती हमेशा बराबर की हैसियत वालों से की जाती है’।मगर आज के संदर्भ में यह कहावत झूठी जान पङती है। पिछले कुछ समय से जिस तरह से विश्वपटल पर राजनीतिक समीकरण बदले हैं उसे देखकर तो यही लगता है कि कूटनितिज्ञ संबंधो की बुनियाद आर्थिक रिश्तों पर रखी जाने लगी है।
अमरीका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अपना पहला राजरीय अतिथि बनाया। ओबामा के 10 महीने के शासन में यह पहला मौका है जब दोनों देशों के रिश्तों में इतनी गर्माहट आई हो। दोनों देशों के बीच आतंकवाद, स्वास्थय, सुरक्षा, हरित टेक्नोलोजी सहित अनेक सहमति पत्रों पर दस्तखत हुए मगर एटमी उर्जा, तालिबान-पाकिस्तान, चीन और जलवायु जैसे अति संवेदनशील मुद्दों पर मतभेद अभी भी कायम है और यही भारत के लिए सबसे बङी चिंता का कारण है। पिछले कुछ सालों में चीन अमरीका का सबसे बङा व्यपारिक साझेदार बनकर उभरा है। वहीं पाकिस्तान की ज़रूरत अमरीका को अफगानिस्तान में अधूरे सैन्य मिशन के लिए ज़रूरी है। ओबामा ने चीन यात्रा के दौरान तिब्बत को चीन का अभिन्न अंग बताकर भारत की मुश्किलें ओर बढा दी। पाकिस्तान से मिलने वाली सहायता राशि भी ओबामा सरकार ने दोगुनी कर दी है। इस यात्रा से मनमोहन सिंह अमरीका द्वारा दवाब बनाकि 26/11 के दोषियों पर कार्यवाही करवाने में भी नाकाम रहें है। अमरीका के साथ रिश्ता मजबूत करने से पहले भारत इन तथ्यों को नज़र अंदाज़ नहीं कर सकता।
आज अमरीका और भारत दोनों को एक दूसरे की ज़रूरत है। अमरीका पूंजी के साथ-साथ टेक्नोलोजी का भी भारत में सबसे बङा स्रोत है। अमरीका से आर्थिक रूप से जुङकर ही भारत चीन से आगे निकल सकता है। वहीं अमरीका अभी भी मंदी की मार से बाहर नहीं निकल पाया है। अंतराष्ट्रीय बाज़ार में डालर पर मंडराते संकट के कारण भी अमरीका का झुकाव भारत की तरफ बढा है। आने वाला वक्त ही इस रिश्ते की दिशा तय करेगा मगर इस यात्रा में जिन सहमति पत्रों पर हस्ताक्षर हुए हैं उन्हें देखकर तो यही लगता है कि इस दोस्ती की इमारत आर्थिक रिश्ते की नींव पर रखी जा रही है।

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