“मैं इज़्जत वाला हूँ, मैंने अपनी बेटी को मारा है”। यह किसा फिल्म का डायलाग नहीं है। यह हकीकत है। यह हकीकत है उत्तर भारत के कुछ राज्यों खासकर हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश की है जहाँ इसे इज़्जत की रक्षा के नाम पर उठाया गया कदम कहतें हैं और कुछ इसे आनर किलिंग कहते हैं।
हरियाणा के मनोज- बबली और आई आई एम सी की निरुपमा पाठक हत्याकांड तो आप सबको याद होगा। मनोज और बबली ओनर किलिंग का शिकार होने वाला न तो पहला जोङा था और निरुपमा न ही आखिरी लङकी है। इज़्जत के नाम पर हत्याएं पहले भी होती थी और आज भी जारी है मगर अब ओनर किलिंग का नाम आते ही एक नाम और मन में आता है और वह है खाप पंचायत का। खाप पंचायत एक गोत्र में शादी के खिलाफ है और इसका उल्लंघन करने पर या तो वह पति-पत्नि को भाई-बहन बनकर रहने का हुक्म सुनाती है और इससे भी मन न भरे तो मौत के घाट उतारने का। यही नहीं खाप पंचायत केवल गोत्र में ही नहीं बल्की जाती से बाहर शादी करने पर भी यही सजा सुनाती है। ऐसा करने के पीछे वह संस्कृति, समाजिक मूल्यों की दुहाई देती है। खाप पंचायत का मानना है कि इससे हमारी आने वाली नस्लें खराब होंगी।
मैं इनकी इन बातों से इत्तफाक रखता हूँ। मगर संस्कृति, समाज और मूल्यों के नाम पर किसी की हत्या कर देना कहाँ तक उचित है। आखिर इन्हें समाज का ठेकेदार होने का तमगा किसने प्रदान किया। क्या ये पंचायते देश के संविधान से ऊपर है। अगर यह पंचायते खुद को समाज का ठेकेदार मानती है तो हरियाणा में लङकियों की घटती संख्या को रोकने, लङकियों कि शिक्षा को बढावा देने को लेकर कोई फैसला क्यों नहीं सुनाती। जब गाँव का लङका गोरी मेम से शादी करके गाँव लाता तो यह पंचायतें उसे यह फरमान क्यों नहीं सुनाती। पिछले कुछ समय से हरियाणा में लङकियों की घटति संख्या के कारण वहाँ लङकियाँ शादी के लिए दक्षिण भारत से खरीद कर लाई जाती है। इस मसले पर यह खाप पंचायत चुप क्यों है।
भारत में आज भी 60 प्रतिशत लोग गाँव में रहते हैं। भारत की पहचान इसके गावोँ में रची-बसी संस्कृति से है, समाज से है और समाज के कुछ नियम-कानून, मान-मर्यादा होती है। जब यह नियम-कानून, मान-मर्यादा ही नहीं रहेगें तो समाज नहीं रहेगा और समाज नहीं रहेगा तो संस्कृति नहीं रहेगी। भारत की पहचान नहीं रहेगी। भारत अपनी ख्याती खो देगा। मगर इसे बचाने के नाम पर जो हत्याएं हो रही है उससे क्या भारत का नाम रोशन हो रहा है।
दरअसल ये भारतीय समाज के परिवर्तन का वह अधकचरा दौर है जिसमें युवा बंदिश को तोङकर आज़ाद होना चाहता है और यह नागवार गुजर रहा है समाज के ठेकेदारों को। यह ठीक उसी तरह है जैसे एक राजा कई सालों से राज कर रहा हो और एकाएक प्रजा उस राज से आज़ाद होना चाहती है और उस राजा को अपनी सत्ता खिसकते हुए दिखाई दे रही हो।
आज हम आज़ाद देश के नागरिक हैं। हम 21वीं सदी में प्रवेश कर चुके है। ग्लोबलाईजेशन और इंटरनेट ने देशों की सीमाओं को खत्म कर दिया है। सबको अपनी ज़िदगी अपने तरीके से जीने का अधिकार मगर कहीं न कहीं हमारी पहचान हमारी संस्कृति, हमारे मूल्यों में है जो हमें पीढी दर पीढी हमारे बङे-बुजर्गों से मिली है। अब यह युवा पीढी के हाथ में है कि वह आने वाली पीढी को किस तरह का समाज देना चाहती है।
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